Hasya Kavita

Hasya Kavita in Hindi, Hasyakavita, Funny Shayari, Funny Hindi Poems, हिन्दी हास्य कविता, हास्य कविता

275 Posts

202 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 4683 postid : 95

लकड़ी से तगड़ी आरी –हास्य कविता (Hasya kavita)

Posted On: 16 May, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अशोक चक्रधर (Ashok Chakradhar) की हास्य कविताओं को मंच पर बहुत ही पसंद किया जा रहा है और इसीलिए आज एक बार फिर आप लोगों तक प्रसिद्ध हास्य कवि अशोक चक्रधर (Ashok Chakradhar) की एक हास्य रचना लाएं है जो वनों को बचाने का संदेश देती है. यह हास्य रचना ना सिर्फ मन में गुदगुदी लाती है बल्कि यह कविता हमें एक पाठ भी सिखाती है कि यदी हम वनों को यूं ही बर्बाद करते रहेंगे तो जल्द ही पछताएंगे भी.


funny-treeलकड़ी से तगड़ी आरी


जंगल में बंगले
बंगले ही बंगले
नए नए बनते गए
बंगले ही बंगले।


बंगलों में चारों ओर
जंगले ही जंगले
छोटे-छोटे बड़े-बड़े
जंगले ही जंगले

जंगल से काटी गई
लकड़ी ही लकड़ी,
चीरी गई पाटी गई
लकड़ी ही लकड़ी।

चौखट में द्वारों में
लकड़ी ही लकड़ी
फ़र्शों दीवारों में
लकड़ी ही लकड़ी।

मानुस ने मार बड़ी
मारी जी मारी,
लकड़ी से तगड़ी थी
आरी जी आरी।

आरी के पास न थीं
आंखें जी आंखें,
कटती गईं कटती गईं
शाखें ही शाखें।

बढ़ते गए बढ़ते गए
बंगले ही बंगले,
जंगल जी होते गए
कंगले ही कंगले।

हरा रंग छोड़ छाड़
भूरा भूरा रंग ले,
जंगल जी कंगले
या बंगले जी कंगले?


| NEXT



Tags:                         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (51 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Neetesh Shakya के द्वारा
December 23, 2013

Vill Jagannthpur Post Lakhanmau Dist Mainputi U.P.

XXX men के द्वारा
October 28, 2011

कुतता कमीना


topic of the week



latest from jagran