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वजन घटाऊ हास्य कविता : मोटूराम

Posted On: 8 Aug, 2011 में

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आजकल हर तरफ आपको दो तरह के टिप्स बहुत ज्याद देखने को मिलेंगे एक डेटिंग टिप्स और दूसरा डायटिंग टिप्स. किसी भी वेबसाइट को खोलकर देख लो या किसी भी न्यूजपेपर या मैग्जीन को देख लो किसी ना किसी पेज पर तो आपको डायटिंग के चर्चे देखने को मिल ही जाएंगे. छरहरे बदन की चाह रखने वालों की बढ़ती संख्या ने मोटे लोगों को भी पतला होने पर विवश कर दिया है क्यूंकि कई जगह अब मोटा होने पर टैक्स जो लगने लगा है.


वैसे मोटा होना या पतला होना पूरी तरह अपने ही हाथ में होता है. जैसा खाओगे वैसा बनोगे. हां, कभी-कभी यह हमारे नियंत्रण में नहीं होता लेकिन अगर मन में चाह हो तो कोई भी ‘परफेक्ट फीगर’ का मालिक बन सकता है.


उपरोक्त बातों को ही ध्यान में रखकर एक हास्य कवि मजाल जी ने एक बाल हास्य कवितामोटूराम” लिखी है.


हास्य कविता : मोटूराम


fat-man-cartoonमोटूराम ! मोटूराम !

दिन भर खाते जाए जाम,

पेट को न दे जरा आराम,

मोटूराम ! मोटूराम !

स्कूल जो जाए मोटूराम,

दोस्त सताए खुलेआम,

मोटू, तू है तोंदूराम  !

हमारी  कमर, तेरा  गोदाम !


तैश में आएँ मोटूराम !

भागे पीछे सरेआम,

पर बाकी सब पतलूराम !

पीछे रह जाएँ मोटूराम !


रोते घर आएँ मोटूराम,

सर उठा लें पूरा धाम,

माँ पुचकारे छोटूराम,

मत रो बेटा , खा ले आम !


जब जब रोतें मोटूराम,

तब तब सूते जाए आम,

और करें कुछ, काम न धाम,

मुटियाते जाएँ मोटूराम !


एक दिन पेट में उठा संग्राम !

डाक्टर के पास मोटूराम,

सुई लगी, चिल्लाए ‘ राम’ !

‘ राम, राम ! हाए राम !’


exerciseतब जाने  सेहत के दाम,

अब हर रोज़ करें व्यायाम,

धीरे धीरे घटा वज़न,

पतले हो गए मोटूराम !




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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Awantika के द्वारा
May 5, 2012

Very nice poem…:)

anjali के द्वारा
September 22, 2011

its really funny everyone should read it !!!!!!!!! if u finding any funny poem please read it

    neelam kulshrestha karun के द्वारा
    September 6, 2013

    खर्राटों  की दुकानः श श श……….. सावधान—-सुनो लगाकर अपने कान……. खबर बडे मतलब की है, थोडी-थोडी गफलत भी है, सन्नाटों के नींद ग्राम में ,खर्राटों की दुकान सजी है। .मोलभाव कुछ नहीं यहाँ पर, किसिम-किसिम के खर्राटे हैं, कुछ ट्रेनों को टक्कर देते, कुछ मेंढक सा टर्राते हैं, कुछ में इतनी सारी ताकत ,भूकम्प भी इनसे टकराते हैं , बेसुर सा संगीत कभी ये, डिस्को जैसा भरमाते हैं , भ्रम देते और ध्वनि करते हैं , सागर की लहरों जैसे , हथियारों से लैस नहीं पर, रणभूमि में लडते जैसे , मुँह फाडे और नाक फुलाए, ये सारे बेफिक्र बडे हैं , अव्वल आने की आशा में , पूरी ताकत से लगे पडे हैं , हलचल रौनक इतनी मानो ,तडक-भडक बारात चली है, सन्नाटों के नींद ग्राम में , खर्राटों की दुकान सजी है ।            - नीलम कुलश्रेष्ठ करुण


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