Hasya Kavita

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पतियों के लिए खास हास्य कविता : तुम्हारा मायके जाना (HASYA KAVITA)

Posted On: 19 Jan, 2012 में

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हिन्दी हास्य कविता के इस अंश में एक बार फिर हम हाजिर हैं एक बेहतरीन कविता लेकर. कविता एक परेशान पति पर आधारित है जो अपनी पत्नी के मायके जाने पर दुखी है, यह कविता मूलत: बेढब बनारसी की है. हालांकि कविता के बारें में स्पष्ट रूप से तो मुझे भी नहीं मालूम.


iFunny KITCHENतो चलिए मजा लेते हैं एक बेहतरीन हास्य कविता. कविता में एक पति अपना दुखड़ा रो रहा है कि आखिर उसके साथ ऐसा क्या क्या होता है जब उसकी पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली जाती है,.


हास्य कविता: तुम्हारा मायके जाना

तुमने कहा चार दिन, लेकिन छह हफ्ते का लिखा फसाना

सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना !


कहां कढ़ाई, कलछी, चम्मच, देग, पतीला कहां कटोरी,

नमक, मिर्च, हल्दी, अजवायन, कहां छिपी है हींग निगोड़ी,

कांटे, छुरियां, प्लेटें, प्याले, सासपैन इक ढक्कन वाला,

कुछ भी हमको मिल न सका है, हर इक चीज छुपा कर छोड़ी


सारी कोशिश ऐसी, जैसे खल्लड़ से मूसल टकराना

सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना !


आटा, सूजी, मैदा, बेसन, नहीं मिले, ना दाल चने की

हमने सोचा बिन तुम्हारे, यहां चैन की खूब छनेगी,

मिल न सकी है लौंग, न काली मिर्च, छौंकने को ना जीरा


सोडा दिखता नहीं कहीं भी, जाने कैसे दाल गलेगी,

लगा हुआ हूं आज सुबह से, अब तक बना नहीं है खाना

सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना !


आज सुबह जब उठकर आया, काफी, दूध, चाय सब गायब,

ये साम्राज्य तुम्हारा, इसको किचन कहूं या कहूं अजायब,

कैसे आन करूं चूल्हे को, कैसे माइक्रोवेव चलाऊँ,

तुम थी कल तक ताजदार, मैं बन कर रहा तुम्हारा नायब,


सारी कैबिनेट उल्टा दी, मिला नहीं चाय का छाना,

सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना !


आलू, बैंगन, गोभी, लौकी, फली सेम की और ग्वार की,

सब हो गये अजनबी, टेबिल पर बस बोतल है अचार की,

कड़वा रहा करेला, सीजे नहीं कुंदरू, मूली, गाजर,

दाल मूंग की जिसे उबाला, आतुर है घी के बघार की,


नानी के संग आज बताऊं, याद आ रहे मुझको नाना,

सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना !

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1 प्रतिक्रिया

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sunil kumar के द्वारा
February 2, 2012

bhai sahab kavi mahodya ji ye aap beeti hai ya jag beeti


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