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HASYA KAVITA IN HINDI: हिन्दी बनाम अंग्रेजी: एक “गंभीर” हास्य कविता

Posted On 21 Apr, 2012 में

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हिन्दी हास्य कविता

आज हम अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को वह सम्मान नहीं देते जो सम्मान हमारे दिल में “अंग्रेजी” के लिए होती है. अंग्रेजी को हम पेशन, जुनून और स्टाइल का अवतार मानते हैं तो हिंदी हमें गंवारों और गांवो की भाषा लगती है. अंग्रेजी सिखने के लिए हम 1000 से 5000 रुपए तक आराम से खर्च कर देत हैं लेकिन हिंदी सिखने के लिए कभी कोई ट्यूशन नहीं लेता, उलटा लोग कहते हैं हिंदी भी क्या सिखना इतनी तो आसान है. लेकिन जनाब एक बार हिंदी के सागर में गोता लगाकर देखिए इसकी विशालता में डर भी लगेगा और आनंद भी आएगा. इससे आसान कोई भाषा नहीं है. इसका व्याकरण भी अंग्रेजी के व्याकरण की तरह असीम और बहुत बड़ा है.


Hasyakavita in hindi

काका हाथरसी ने हिन्दी की स्थिति पर कटाक्ष करते हुए एक बेहद विचारणीय हास्य कविता लिखी है जिसे मैं आपसब से बांटना चाहूंगा और इस जागरण जंक्शन के मंच पर सभी पाठकों से आग्रह करूंगा कि हिन्दी की प्रंशंसा में दो शब्द जरूर लिखें.


हिन्दी बनाम अंग्रेजी एक हास्य कविता : Hindi Hasyakavita

हिन्दी माता को करें, काका कवि डंडौत,

बूढ़ी दादी संस्कृत, भाषाओं का स्त्रोत।

भाषाओं का स्त्रोत कि ‘बारह बहुएँ’ जिसकी

आंख मिला पाए उससे, हिम्मत है किसी?


ईष्या करके ब्रिटेन ने इक दासी भेजी,

सब बहुओं के सिर पर चढ़ बैठी अंगरेजी।

गोरे-चिट्टे-चुलबुले, अंग-प्रत्यंग प्रत्येक,

मालिक लट्टू हो गया, नाक-नक्श को देख।


नाक-नक्श को देख, डिग गई नीयत उसकी,

स्वामी को समझाए, भला हिम्मत है किसकी?

अंगरेजी पटरानी बनकर थिरक रही है,

संस्कृत-हिन्दी, दासी बनकर सिसक रही हैं।


परिचित हैं इस तथ्य से, सभी वर्ग-अपवर्ग,

सास-बहू में मेल हो, घर बन जाए स्वर्ग।


घर बन जाए स्वर्ग, सास की करें हिमायत,

प्रगति करे अवरुद्ध, भला किसकी है ताकत?

किन्तु फिदा दासी पर है, ‘गृहस्वामी’ जब तक,

इस घर से वह नहीं निकल सकती तब तक।






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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manju singh के द्वारा
August 22, 2013

हिन्दी दासी है नहीं है यह चतुर चालाक सिमटी घूँघट में रहे ऐसी यह बहू नहीं आँख खोल करे दुनिया देखे इसे किसी का डर नहीं सीखने सिखाने में इसका सानी कोई नहीं दूसरी भाषाओं को अपनाने में इसे कोई गुरेज नहीं खत्म नहीं होगी हिन्दी मेकओवर करती रहती है विश्व की सबसे ज़्यादा फिल्में हिन्दी में ही बनती हैं।

renu ahuja के द्वारा
August 14, 2012

रानी हिंदी किओ अब जागना होगा संघर्ष अँगरेज़ सौत से करना होगा अब तो प्रश्न प्रतिष्ठा का, या दासी बन जाओ या स्नेह त्याग कर, करवाचौथ सम धर्म निभाओ लगे रहो निज धर्म में पथ मिल जाए आप स्नेह त्याग से मिट जाए सकल कष्ट संताप मिट जाए संताप लिए प्रेम का रंग हिंदी फिर पटरानी हो जो अपनाए नवरंग – काका जी की कविता पढ़ उनकी याद आ गयी ऐसे श्रेष्ठ कविवर की कवितायें सुनकर हम बड़े हुए हमारी अहो भाग्य …..काकाजी आपको नमन जीवन में आपसे मिलने की तमन्ना अधूरी ही रह गयी पर आपकी कविताओं से आप सदा जीवित रहेंगे. -रेनू आहूजा

aditya singh के द्वारा
May 8, 2012

It is very interesting and i like this wapsite. . I am very impress

vishleshak के द्वारा
April 21, 2012

आदरणीय महोदय ,काश ,गुलाम मानसिकता के भारतीय लोग इस तथ्य,जोकि सत्य भी है,समझ पाते,फिर भी मैं आपकी भावना का सम्मान करता हूॅ और यह निवेदन भी करता हूॅ कि क़दम चूम लेती है खुद मंज़िल ,मुसाफिर गर अपनी हिम्मत न हारे ।विश्लेषक&याहू .इन ।


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