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दिल्ली दिलवाली नहीं शर्मिंदा है: हास्य कविता

Posted On: 31 Dec, 2012 में

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दिल्ली में हुए गैंगरेप केस ने आज हर तरफ आग की जो मशाल जलाई है वह बेहद मार्मिक और उत्तेजना पैदा करने वाली है. दिल्ली की आवाम आज इंसाफ चाहती है. इंसाफ उस शख्स के लिए जो दूसरों को जगाने के लिए खुद सो गई. वो लड़की मरी नहीं शहीद हुई है. देश की करोड़ों महिलाओं को लड़ने की एक नई चाह देने वाली इस वीरांगना को मरा घोषित करना गलत है इसे शहीद कहना ही सही है. इस महिला की मृत्यु पर कुछ लोगों ने कैंडल मार्च निकाला तो कुछ ने जगह जगह जाकर रोष प्रकट किया. लेकिन सबसे करारा प्रहार किया है उन सिपाहियों ने जो कलम से दुनिया हिलाने का जज्बा रखते हैं. कुछ ऐसे ही लेखकों की प्यारी सी कविताओं के साथ मैं आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक बधाई देना चाहता हूं.


हिन्दी हास्य कविता: दिल्ली तू रखवाली है

ऐ दिल्ली ! नहीं तू दिलवाली है
तेरी तारीखें स्याह और काली है

कोई महफूज़ नहीं तेरी पनाह में
तू नारी के दामन पर एक बदनुमा गाली है

करती है पुरे देश को शर्मसार तू
तेरे आंसू तेरा चेहरा सब कुछ जाली है

लुटे नारी की लाज तेरे आँगन में
और तू रहे नशे में मतवाली है

शीला , जया ,सुषमा और सोनिया
दिग्गजों की बस तू करे रखवाली है!


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हिन्दी हास्य कविता: आज सब शर्मिंदा है


सब शोकाकुल है सब शर्मिन्दा है…
मैं भी आप भी वो भी ये भी…

वी वांट जस्टीस से लेकर युवराज के सिक्स तक सलमान के दबंग तक….

दाँतेवाड़ा की लक्ष्मी से पूर्वोत्तर की मनोरमा तक…

दिल्ली की निर्भया से हिमाचल और जयपूर की अनाम तक….

स्मृति इरानी से विश्वसुंदरी लिनोर अबार्गिलक तक।
फूलन देवी से इरोम शर्मिला तक…

नोएडा से गुवाहाटी तक,
राजस्थान से बिहार तक…

सब शर्मिन्दा है,सब शोकाकूल है…

इतने मौके शर्मिन्दगी और शोक के की एक आदमी की दस जिन्दगी भी कम पड़ जाये शोक मनाने मेँ…

दस दिन से कॉमेडी पेज से लेकर राष्ट्रवादी पेज तक शोकसंतप्त दिख रहे,
कल को सब गाली-गलौज और भद्दे जोक शुरु कर देँगे….

जोक और गालियो का आधार निर्दोष ‘माँ-बहन’।

यहाँ तो रोज शाब्दिक बलात्कार आम है।
छुपछुप कर कौन कहे ये तो सरेआम है
खुल्लम खुल्ला खुल्लेआम है।

मुरादाबाद ट्रेन मेँ टी-शर्ट निकाल के फेक दी लड़की की बदमाशो की,
तमाशीन हा हा ही ही
हम शर्मिन्दा है….

रोड से बस तक ऩजरो से लेकर शब्दो तक से मानसिक बलात्कार कोई नई बात नहीँ है…
कहते है हम तो शर्मिन्दा है….

अरे यारो!अभी समाज में लाखो दामिनि जूझ रही है,
ये वक्त अब शर्मिन्दा होने का नहीँ,
शर्मिन्दा करने का है।
अपना नजरिया बदलने का है…

विरोध किजिये जहाँ छेड़छाड़ देखिये,
विरोध किजिये जहाँ अत्याचार देखिये।

मदारीयो और डमरु पार्टियो के भरोसे मत रहिये,
समाज आपसे और मुझसे बनता है।

हर कोई ये ठान ले की अपने आस पास कुछ गलत नहीँ होने देगा,
तो ही समाज मेँ परिवर्तन आयेगा।

जनता की भावनाओ को बेच के सियासती रोटीसेंकवा के पिछे भागना बन्द किजिये।

अत्याचारो का विरोध किजिये,
अत्याचारि को शोकसंतप्त किजिये।

अत्याचारी को शर्मिन्दा कराने से कुछ नहीँ होगा,
क्योंकी शर्म उनको आती नहीं।


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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Mufazzal Husain के द्वारा
January 3, 2013

Dear Sir, Dilli nahi tu dilwaali hai Rachnaa meri swaracheet hai aur mene ise facebook par pichhle hafte post kiyaa thaa . aapse nivedan hai ki kavitaa ke saath rachnakar kaa naam bhi likhe to behtar hogaa.

    Hasya Kavita के द्वारा
    January 8, 2013

    महोदय मुझे क्षमा करें, मुझे नहीं पता था कि यह रचना आपकी है और इसीलिए मैंने इस ब्लोग में एक जगह ” कुछ ऐसे ही लेखकों की प्यारी सी कविताओं के साथ “ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है. आपकी यह कविता बेहद सुंदर है और मैं इस कविता में अब आपका नाम भी लिख रहा हूं. आपकी कविता मुझे बहुत अच्छी लगी. आप अन्य कविताएं भी पढ़े.


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